प्रभु आप जगो परमात्म् जगो, मेरे सर्व जगो सर्वन्न जगो ! दुखान्त् खेल का अन्त करो, सुखान्त् खेल प्रकाष करो !
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परिवर्तन अपने आप में
तुम्हारे भाग्य में भगवान है न कि संसार
मर्यादा और प्रेम करूणा और पुरूषार्थ
आनन्द तुम्हारा अंत नहीं आदि भी
शक्ति में शिवत्व की स्थापना
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