प्रभु आप जगो परमात्म् जगो, मेरे सर्व जगो सर्वन्न जगो ! दुखान्त् खेल का अन्त करो, सुखान्त् खेल प्रकाष करो !       
 
Vani
  •  आज तो वक्त है, तस्मात् उत्त्ष्ठि कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः़। किसलिए हमको युद्ध करना है- अन्धकार से प्रकाश की ओेर जाना, अभारतीयता से भारतीयता की ओर जाना। भारतीयता के माने ईश्वर की ओर गमन। भारतीयता का तात्पर्य यही है कि जीवन के क्रम का लक्ष्य एक मात्र ईश्वर हो। ईश्वर को आधार बनाकर के हम उसकी ओर जीवन को ले चलें। यह जब तक हमारे बीच में नहीं आता है तब तक हम दुःख के भाव में रहेंगे।


  •  जब तक भगवान का हमारे जीवन में आगमन न होगा तब तक जितना भी कार्य हम सबों का है व्यवहारिक होगा, स्वार्थपरायणता के अन्तर्गत होगा। उस में दिव्यता न होगी। इस लिए हम सब प्रार्थना करें उसके आगमन के लिए, उस को पाने के लिए। हम प्रार्थना करें क्योकिं वर्तमान भाव में वह काल रूप होकर जिस प्रकार पिता अपने बच्चे के लिए काल रूप होकर दण्ड देने लगता है वैसे ही हमारे स्वभाव को छुड़ाने के लिए पारस्परिक लड़ाकर, उबाकर, पचाकर, उपराम करते हुए इस स्तर से आगे बढ़ सकने में समर्थ हो सकेगा।


  • संत पुरुषार्थ स्रोत आप को जगाता है। आपको, यथार्थ भाव को, परमात्म स्वरूप को जगाता है। जो आप में है, आप का है, जिसमें आप हैं उस सर्व सर्वत्र को जागृत करके आप नामरूप शरीर भाव में आ गये हैं, उस आप की परिधि को, आवरण को, तोड़ना चाहता, तोड़वाना चाहता है।


  • जप करें, ध्यान करें, तप करें, जो भीकरें उस अपने ‘मैं’ परमात्मा को प्राप्त करने के लिए करें। सब साधन कायथार्थ भाव अपने स्वरूप को प्राप्त करना ही है।


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