संत सच्चा
जन्म सन् 1914 बिहार, तथा निर्वाण श्री सच्चा आश्रम अरैल प्रयाग सितम्बर 1983. लीला स्थली:- श्री सच्चा आश्रम अरैल प्रयाग (भारत)
‘‘सृष्टि क्रम-और नारदीय परम्परा’’
बाबा नारदीय परम्परा के सन्त कहे जाते हैं। कुछ लोगों के अनुसार स्वयं ही वे नारद के भिन्न-भिन्न समय में जगत के भिन्न-भिन्न कारणों से भिन्न-भिन्न शरीर में रहने वाली नारदीय आत्मा है।
पौराणिक सत्य के अनुसार ब्रह्मा ने जब सृष्टि संकल्प लिया तब उन्होने आत्मीय सृष्टि से मनस नामक तत्व का संकल्प किया। तदुपरान्त वे मानसिक सृष्टि का निर्माण किए। उसी मानसिक सृष्टि से वे चार ऋषि कुमारों को प्रकट किए, जो (सनक, सनन्दन सनातन, सनत्कुमार के) नाम से विख्यात हुए। मानसिक सृष्टि का यह शरीर अमर तत्व प्रधान रहने के कारण इन्हें अमर शरीर भी कहा गया। अतः इन कुमारों के शरीर का कभी नाश न हुआ, न ही होगा। परन्तु सतोगुण प्रधान इस शरीर से संसार ग्रहण न करने का संकल्प ले आज भी अदृृश्य जगत और दृश्य जगत के संधि पर खड़े होकर आत्म-रमण कर रहे हैं। वे आत्मा के आनन्द से इतने उत्पल्लवित हुए कि उन्हें रजोगुणी तथा तमोगुणी सृष्टि रास न आयी। इसके बाद सृष्टि रचयिता बहुत ही दुःखी हुए। कारण, वे लोग परमपिता की इच्छा पूरी न कर सके। तब परमपिता ने मानसिक संकल्प का आविर्भाव चित्त में किया। यहाँ यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि पूर्व में ब्रह्मा ने जो संकल्प लेकर सृष्टि का निर्माण किए, उससे मनस् नामक तत्व से आत्मा का आविर्भाव हुआ। इसके बाद इन कुमारों का अवतरण हुआ। जिसे सृष्टि का प्रथम सोपान कहा गया।
‘‘ सृष्टि क्रम-और मानसिक सृष्टि’’
दूसरे सोपान में परमपिता ने मनस् तत्व को धारण कर अपने चित्त में संकल्प किया। इस संकल्प से जो शरीर निकला उसे शास्त्र में कारक-शरीर या कारक पुरूष के रूप में वर्णन किया गया है। देवर्षि नारद का शरीर इसी कारक तत्व से रचा गया। लेकिन परमपिता के चित्त में भक्ति की प्रगाढ़ता और बहुल्ता के कारण इस शरीर में मात्र भगवद् भक्ति ही प्रधान रही। सद्गुण की चिन्मय सत्ता का विकास शील इस शरीर को नारदीय शरीर कहते हैं। जिसे भक्ति शास्त्र में दिव्य शरीर, कारक शरीर, भाव देह आदि के नाम से जाना जाता है। इस शरीर में ही देवर्षि नारद का वास है। जो, आत्मा परमात्मा, मनस और चेतन तत्व तक यात्रा करती रहती है।
इसके बाद भी परमपिता ने देखा कि सृष्टि का क्रम आगे नहीं बढ़ रहा है। तब उन्होने अपने संकल्प से पुनः मनस चित्त और आत्मा को विस्तरित करते हुए पंच तन्मात्र और पंच भूतो की सृष्टि कर एक स्थूल शरीर का निर्माण किया। वह शरीर नारी का था जिसे सविता (सरस्वती) के नाम से जाना जाता है। तदुपरान्त सृष्टि के विकास के लिए परमपिता ने स्वयं चित्त में काम नामक तत्व का निर्माण किया। इस प्रकार आज की मैथुनि सृष्टि ब्रह्म और गायत्री के स्थूल संम्बन्ध से शुरू हुई। जिससे सप्त ऋिषियों का प्रदुर्भाव हुआ और सृष्टि क्रम आगे बढ़ता गया। सृष्टि क्रम में आत्मा से आत्मिक सृष्टि, परमपिता के मन से मानसिक सृष्टि तथा उनके क्रामांश बीज से मैथुनी सृष्टि से क्रम आगे बढ़ता गया। आज तक के सृष्टि विकास क्रम में अपने ही द्वारा सृजित आत्मीय सृष्टि को धीरे-धीरे जीव और जगत में प्रकट कर इस संसार का निर्माण काल के अनुसार चार भागों में बाँट दिया। जिसे सतयुग, द्वापर, त्रेता और कलियुग कहा गया।
‘‘नारद और नारदीय देह’’
नारद जी का शरीर जो ब्रह्मा जी के चित्त में उठे भागवत-भक्ति और मानसिक संकल्प का परिणाम हुआ। वह न मैथुनी सृष्टि के अन्तर्गत रही न मानसिक। कारण मैथुनी शरीर में काम बीज की आवश्यकता होती है बिना शारीरिक वासना के काम बीज की शक्ति शरीर में ही गुप्त रहती है, अर्थात् बिना प्रवल वासना और सृष्टि विकास की प्रक्रिया से प्रभावित होकर मैथुनी सृष्टि संभव नहीं है।
ऊपर यह स्पष्ट है कि इस प्रकार के तत्व परमपिता में तब विद्यमान न थे। जब नारद के लिए संकल्प उठा। उन्हे मानसिक भी नहीं कहा जा सकता। कारण मनस को धारण के लिए ही चित्त का प्रदुर्भाव होता है मनस तत्व स्वयं में सत-संकल्प से सम्पादित है। अतः उसमें अमरत्व है। उससे निस्पादित सृष्टि अमरत्व ही होगी दूसरी नहीं। परन्तु नारद का शरीर ब्रह्म-मानस और चित्त का संयुक्त परिणाम हुआ। अतः उसे न मानसिक कहा गया न ही मैथुनी। यह दोनों के बीच की सृष्टि है। जिसे उभय शरीर या कारक शरीर के नाम से जाना जाता है। पातंजलि यह अपने योग शास्त्र के सूत्र में कहते हैं कि योगी अपने समाधि की सविकल्पक भूमिका में चित्त का संधान कर कई शरीर का निर्माण कर सकता है। और एक ही जन्म मंें कई जन्मों के संस्कार भोग सकता है। लेकिन पतंजलि का यह सूत्र मात्र मैथुनी शरीर और सृष्टि के लिए ही लागू होता है, न कि कारक शरीर के लिए। कारक शरीर की उत्पत्ति मात्र भागवत् शक्ति में चैतन्य तरंगों और परमाणुओं से हुई है। अतः उनमें चित्त का होना अति आवश्यक घटक है। तथा चित्त के निर्माण के बाद ही मनोमय जगत से अन्नमय सृष्टि का निर्माण संभव है। अतः देवर्षि नारद का यह शरीर मात्र भागवद भक्ति को जीव तक पहुँचाने के उपक्रम में देखने को मिलता है। दूसरे शब्दों में नारद ही एक ऐसी परम्परा है जो परमपिता ब्रह्मा और उसके मैथुनी सृष्टि के बीच भागवत तरंग और प्रवाह भरने के लिए बनायी गयी व्यवस्था है।
भागवद भक्ति के महाभाव को धारण करने के लिए यह शरीर मात्र भाव शरीर ही है। अतः अधो-लोक से मृत्यु-लोक और मृत्यु लोक से ऊपर के लोक में आने और जाने में इस शरीर में ही नारद जी भ्रमण करते रहते हैं। उनका यह भाव शरीर अमर-तत्व से परिपूर्ण तों है, लेकिन अमर नहीं। यह शरीर परमपिता के मानसिक सृष्टि अर्थात् मनस-तत्व से पैदा न हुआ। अतः यह अमर नहीं हो सकता। कारण ब्रह्म मनस का पूर्ण तरंग में ही अमरत्व रहता हैै। जिसने चार कुमारों का सृजन किया था। सृष्टि के क्रम में वे कभी भी मृत्यु को प्राप्त न होगें। परन्तु कारक शरीर भाव शरीर है। दिव्य शरीर है। यह शरीर आवश्यकता पड़ने पर किसी मृत्युलोक के शरीर का भी आश्रय ले सकता है। अतः नारदीय श्रोत के परम्परा में भाव देह का श्रोत जो नारद जी स्वयं धारण किए हुए है। वहीं भागवत इच्छा से अलग-अलग मनवन्तर या युग मंें (वे मृत्युलोक के प्राणियों में भगवद् भक्ति के संचार के लिए) अपने संकल्प से मैथुनी शरीर का भी आश्रय लिए हैं। जिसका वर्णन नारद पुराण से लेकर बहुत से ग्रन्थों मंें देखने को मिलता है।
‘‘नारद जी और पौराणिक साक्ष’’
मूल बात यह है कि नारद जी के अवतार की बात भी पुराणों में मिलती है। वे मैथुनी शरीर मंें रह कर भी कार्य करते देखे गये है। नारदीय परम्परा में यह सत्य स्वीकार करने में हर्ज न होगा कि नारद के मूल भाव देह से भगवद् संकल्पानुसार नारद जी का जन्म और मृत्यु दानों ही पुराण और वैदिक साहित्य में देखने को मिलता है। नारदीय परम्परा का यह मूल देह सदा ही सूक्ष्म और कारण देह में कारण भाव में ही रह कर अपने भाव देह से ऊपर के सभी लोकों में भगवद्-भक्ति का प्रचार प्रसार करता देखा गया है। पोराणिक साक्ष्य और धार्मिक साहित्यों में नारद जी किसी भी लोक में कही भी बिना रोक-टोक के आ और जा सकते हैं। इस परम्परा का मात्र उद्देश्य है, भागवद् भक्ति का संरक्षण और समर्थन। सृष्टि के आरम्भ से ही यह नारदीय भाव, भाव देह द्वारा प्रकट होते देखा गया है।
सच्चा बाबा का यह देह भी कुछ नारदीय परम्परा के भाव देह का ही परिणाम है। सच्चा बाबा के इतिहासकारों द्वारा यह चर्चा भी सुनने को यदा-कदा मिली है कि यह उनका 13वाँ या 14वाँ शरीर है। इसकी पुष्टि भी संत श्री के शिष्यों द्वारा होती है। परन्तु उनकी राय इस बात पर भिन्न-भिन्न है कि बाबा के इस शरीर के बाद दूसरे शरीर का प्राकट्य होगा या नहीं। इस विषय को लेकर अलग-अलग पुस्तक देखने पर भिन्न-भिन्न सिद्धान्त और भिन्न-भिन्न विचार दिखायी देते हैं। अतः हम उस पचड़ें में न पड़कर परम्परा के शरीर के प्रादुर्भाव और उद्देश्यों की चर्चा और संदर्भित विषयों को समझेंगे।
इस चर्चा को आरम्भ करते हुए हमें यह ध्यान देना होगा कि नारदीय परम्परा का मूल ‘‘भाव-देह’’ मात्र नारद जी हैं। उनका अवतरण मृत्युलोक में शरीर भाव-देह सम्भव नहीं। कारण ब्रह्म चित्त के उद्गम का यह तरंग मृत्युलोक का शरीर सम्हाल न पाएगा।
‘‘भावदेह और नारदीय परम्परा’’
इसलिए नारदीय परम्परा का यह मूल भाव देह अपने सात्विक तरंग और अणुओं से निर्मित होकर एक नए भाव देह में प्रकट हुई उसी भाव देह को ‘सच्चा’ कहा गया। इसे सच्चा तत्व इसलिए कहा गया है कि मृत्यु लोक में वह सत्य का प्राकट्य कर भक्ति को जीव में अहलादित करें। इस प्रकार सच्चा तत्व से ही सच्चा देह भी सत्य प्रधान गुण पर ही आधारित रहने के कारण मृत्यु-लोक के प्राणियों में इसका समावर्तन सम्भव हुआ। अतः सच्चा का शरीर में जन्म तो सम्भव नहीं था। कारण ‘‘भाव-देह’’ मात्र सतोगुण प्रधान होता है। जिसमें मात्र चिन्मय सत्य ही शरीर का गुणधर्म होता है। मृत्यु लोक में शरीर की रचना त्रिगुणात्मक प्रकृति द्वारा ही हुई है। अतः सतोगुण के साथ रजोगुण और तमोगुण के बिना न तो जीव, शरीर धारण कर सकता है, और न ही वह मृत्युलोक में विकसित ही हो पायेगा। हमारे मृत्युलोक की सभी सृष्टि त्रिगुणात्मिका है।
‘‘सच्चा देह’’ तथा ‘‘सच्चा तत्व’’
परन्तु भाव देह मात्र सतोगुण से ही बनता है। अतः इस सृष्टि में जन्म लेना और मृत्यु को प्राप्त करना असम्भव था। त्रिगुणात्मक सत्ता के अन्तर्गत ही मृत्युलोक के आवागमन की प्रक्रिया सम्भव थी। इस स्थिति में जीवों को पुनः उनके श्रोत से मिलाने के लिए सच्चा देह ने मृत्युलोक के एक शरीर में ही काया प्रवेश किया। काया प्रवेश की विधि और प्रक्रिया पर प्रकाश डालना यहाँ असन्दर्भित होगा। कारण विषय की चर्चा सच्चा देह से है। देह के अवतरण से है। कभी समय मिला और रहस्य खोलने की स्वीकृति ऊपर से प्रदान की गयी। तब उक्त स्थिति में किसी अन्य शीर्षक में काया प्रवेश की विस्तार से चर्चा की जायेगी।
यहाँ यह कहना अप्रसांगिक न होगा कि सच्चा तत्व या सच्चा संत मात्र भाव देह है। जो मृत्युलोक में एक निश्चित कार्यक्रम के अनुसार एक शरीर में जो जीवित हो उसमें प्रवेश करके कार्य करती रहती है। इस स्थिति में यह भी प्रश्न उठ सकता है कि जीवित शरीर में एक ही आत्मा काया प्रवेश के बाद एक ही शरीर में दो आत्मा रहने लगती है। उसका समाधान है कि काया-प्रवेश में विदेहाधारणा के सिद्धि के बाद जो विदेह को प्राप्त हुआ है। वह एक मृत्यु लोक के जीवित शरीर में कार्यशील हो सकता है। यह पूँछने पर कि इस प्रवेश का क्या प्रयोजन रहा होगा। तो उत्तर है मृत्युलोक में त्रिगुणात्मक शरीर में व्यक्ति के जागरण के लिए ही सृष्टि के सृजन काल से ही यह व्यवस्था उतरी।
अतः जब मृत्युलोक में त्रिगुणात्मिका शक्ति का आधार बना कर सृष्टि किया गया तब संसार में अविधा (माया) द्वारा जीव को आवृत कर दिया गया। वहीं दूसरी ओर सृजन काल से ही भाव देह का निर्माण नारदीय देह, उसके उपरान्त सच्चा देह या सच्चा भाव देह का निर्माण समग्र जीव जगत को परिवर्तन कर उसे परम-श्रोत से जोड़ने के लिए हुआ।
‘‘सच्चा शरीर और मृत्युलोक का जीवन’’
भाव देह प्रक्रिया के इसी महायोजना में सच्चा तत्व जिस प्रथम जीवित शरीर में प्रवेश किया उसे सन्त शरीर या सच्चा शरीर कहा गया। यहाँ यह भी कहना अनुचित नहीं होगा कि सच्चा शरीर की यह प्रक्रिया सृजन के काल से अभी तक 13/14 बार प्रकट हुई। बारहवीं शरीर संत श्री सच्चा बाबा ‘गिरनारी’ के नाम से जाना जाता हैै। उनकी महा समाधि बनारस के वरूणा और गंगा नदी के संगम पर है। बनारस के पंचकोशी यात्रा में यह पवित्र क्षेत्र आज भी अपनी गरिमा से अध्यात्मिक साधनों को अपने आगे आकृष्ट करती रहती है।
प्रथम से बारहवें शरीर की यात्रा मात्र भाव देह के संचारी भाव की रही। उसकी चर्चा यहाँ प्रासांगिक न होगी न ही उसके बारे में कुछ कहने का आदेश प्राप्त हैं। प्राप्त सूचना के आधार पर बाबा अपने 12/13 वें शरीर में 300 वर्ष तक रहे। अंग्रेजों के शासन काल में उन्हें कर्मशील होने का प्रमाण मिलता है।
‘‘सच्चा बाबा और गिरनार पर्वत’’
कुछ लोगों के अनुसार बाबा अपने उग्र साधना द्वारा मृत्यु लोक के शरीर को सतोगुणी बना कर अमरत्व प्राप्त करने के लिए ‘गिरनार पहाड़’ पर तपस्या करते रहे। ज्ञातव्य हो कि ‘गिरनार पहाड़’ पर ही दत्तात्रेय भगवान की चरण पादुका है। यह भी कहते सुना गया है कि भगवान दत्तात्रेय ही कलियुग में समय के अधिकारी नियुक्त किए गए थे। अर्थात् इन्ही के संरक्षण में मृत्यु-लोक में त्रिगुणात्मिका शक्ति (महामाया) कार्य करती रही। संत श्री सच्चा बाबा इसी भक्ति को प्राप्त करने के लिए दत्त भगवान को प्रसन्न करने लगे और अन्ततोगत्वा उन्हें भगवान दत्त की शक्ति मिली।
‘‘सच्चा बाबा और धौलपुर’’
उसके बाद लगभग बीसवी सदी के आरम्भ में उन्हें भिन्न राजाओं के राज्यों में अस्थायी तौर पर निमंत्रण मिला और बाबा उन्हें अपना आशीर्वाद देकर ब्रिटिश राज्य के खिलाफ आन्दोलन करने की सलाह देेते सुने जाते हैं। जिसमें राजा आवागढ़ राजा पन्ना, दतिया स्टेट, और धौलपुरी आदि सम्मिलित रहा। बाबा चम्बल नदी को ही अपना अध्यात्मिक कार्य क्षेत्र गिरनार से आने के बाद बनाए।
राजा उदय भान सिंह जो लंदन रहकर पढ़ रहे थे और लंदन दरबार के काफी नजदीक समझे जाते रहे। उन्हीं को अपना माध्यम चुनकर सन् 1912 से सन् 1935 तक कार्य करते रहे। बाबा उनके नरसिंह बाग नामक महल में रहे। जहाँ प्रतिदिन राज काज से समय निकालकर राजा, बाबा के दर्शन और बाबा के सत्संग का लाभ उठाने लगे। इस क्रम में वे बहुत से राजाओं को निमंत्रित करते थे। तथा सच्चा बाबा के सत्संग और दर्शन की व्यवस्था भी करते थे।
‘‘सच्चा बाबा का मिशन’’
सच्चा बाबा गिरनारी के मिशन कार्य के तीन पहलू उनके जीवन में देखने को मिलते है। पहला गऊ की सेवा उसका संरक्षण और सम्बर्धन। दूसरा वेद को उचित स्थान दिलाकर वेद रहस्यों को प्रकाशित करना। तथा ब्राह्मण जाति को उसके लोभ से ऊपर उठा कर उसको समाज में उचित स्थान दिलाना। यह भी सुना जाता है कि बाबा अपने योग बल से किसी भी लोक के देव, देवी, योगी, यति, को सूक्ष्म रूप से सम्पर्क बनाकर उनका मन्तव्य लेते और देते थे। जिसे बाबा के दरबार उर्फ फकीरी पार्लियामेन्ट आदि के नाम से जाना गया है।
उत्तरोत्तर सूक्ष्म शक्तियों से उनका संबन्ध तथा उनका कार्य का अनुमान सही-सही लगता तो सम्भव नहीं है। परन्तु यह कहते सुना गया है कि पृथ्वी लोक पर एक नयी व्यवस्था बनाने के लिए ही उनका अवतरण हुआ, ऐसा माना जाता है।
सूक्ष्म ब्रह्मर्षि, देवता और उच्चतर लोक की सभी विशिष्ट आत्माओं का ध्यान जब पृथ्वीलोक (मृत्युलोक) की ओर गया और यह महसूस हुआ कि महामाया के अन्तर्गत पृथ्वी लोक के व्यवस्था में कुछ गड़बड़ है। कहीं न कहीं महामया (अज्ञान की शक्ति) अपना वर्चस्व जीव पर बनाकर उनका उद्धार बहुत ही सीमित मात्रा में करती है। बहुत बार गोष्ठी और परिचर्चा के बाद बाबा को यह आग्रह किया गया कि वे स्वयं मृत्युलोक (पृथ्वीलोक) में आकर जीव-जगत के कल्याण के लिए कार्यशील हों। तब सभी ने उन्हें मदद करने का भी आश्वासन दिया। बाबा ने यह चुनौती स्वीकार कर एक शर्त रखी। शर्त यह थी कि वे पृथ्वी लोक में एक शरीर का आश्रय लेकर कार्य करेंगे, परन्तु सभी उच्चतर शक्तियों को उनके द्वारा कार्य में सहयोग करने के लिए स्थूल भाव में पृथ्वी लोक पर कार्य करना पड़ेगा। जीव जगत में यह सम्पर्क भी जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त होगा। अर्थात् वे लोग भी भाव देह, सुरभ देह आदि के द्वारा ही पृथिवी लोक में एक जीवित शरीर में आश्रय लेकर बाबा के आस-पास सहयोग करेंगे। पूर्ण सहमति को ध्यान में रखते हुए सच्चा तत्व मृत्यु लोक में एक शरीर में प्रवेश करके कार्य करने लगा। यह शरीर लगभग 300 वर्षों तक पृथ्वी-लोक में कार्य करता रहा।
सच्चा बाबा और जगत परिवर्तन
बाबा ने अपनी इस माहा योजना को ‘परिवर्तन’ का नाम दिया तथा उन्होंने संकल्प द्वारा महामाया से यह आश्वासन लिया कि जो महामाया शक्ति जीव को आवरण और दोष में रखकर सदा पृथ्वीलोक पर उसका उसके कर्म-फल के हिसाब किताब पर कार्य कराती है। अब वह ही शक्ति अविधा का परिवर्तन, विद्या शक्ति में करेगी। अर्थात् जो अज्ञान दे रही थी वही पृथिवी-लोक में आकर अविधा का परिवर्तन विद्या भक्ति में करके युग-धर्म में परिवर्तन लायेगी। बाबा का यह कार्य बहुत ही चुनौती पूर्ण कार्य था। युग के अन्तर्दशा में काल को पकड़ कर युग धर्म का परिवर्तन करना। बाबा 300 वर्षों तक सूक्ष्म शक्तियों से संघर्ष करते-करते यह बात स्वीकार करा दिए कि जीव को सीधे उसके आनन्दावस्था से जोड़कर उसका अविद्या का परिवर्तन विद्या भक्ति में कर दिया जाय।
बाबा इस कार्य को अपने पास धौलपुर (म0प्र0) में करने लगे। इस कार्य को स्थूल रूप देने के लिए धौलपुर की ही एक छोटी सी रियासत की महारानी सिया को दैवी प्रेरणा से वरण किया। सिया सरकार के बारे में ज्यादा कुछ कहना प्रासांगिक न होगा। आगे परिवर्तन शक्ति की एक श्रृंखला में उसका अलग से वर्णन किया जाएगा। यहाँ मात्र यह कहना प्रासंगिक होगा कि ‘‘सिया सरकार’’ को ‘‘सच्चा बाबा’’ ने अपने परिवर्तन शक्ति के रूप में स्वीकार कर के उन्हें सदा के लिए राज दरबार से अलग कर अपने पास स्थान दे दिया। श्री माँ अपने एक भतीजे को अपने साथ ले आई। जिसका नाम किशोरी शरण सिंह (राजन) था। वे भी बाबा की कृपा से अविभूत होकर साधना करने लगे। बाबा के लीलाओं तथा उनके कार्य के वर्णन करते हुए नई गढ़ी (मध्य प्रदेश) स्टेट के कुँवर दिवाकर सिह (जो स्टेट के मालिक ठाकुर गोपाल शरण सिंह कवि के छोटे भाई थे।) ने अपनी छोटी पुस्तिका ‘‘फ्राॅम महात्मा गाँधी टू सेन्ट सच्चा बाबा’’ में बाबा के लीला भाव का एक चित्र खींचा है। बाबा के लीला का कुछ भाग जानने के लिए यह पुस्तक पढ़कर पाठक लाभ उठा सकते हैं अर्थात् उस कथानक का वर्णन यहाँ अनावश्यक होगा।
श्री माँ बाबा की परिवर्तन शक्ति ‘‘सिया सरकार’’ सन् 1935 को धौलपुर से प्रयाग के लिए प्रस्थान कर बाँध पर तुलसी अखाड़ा के एक कमरे में रहने लगी। इसका कुछ वर्णन अध्यात्म पत्रिका के एक लेख जो पद्मकान्त मालवीय द्वारा लिखा गया है, पढ़कर पाठकगण अधिक लाभ उठा सकते हैं। बाबा तब धौलपुर में रहकर ही ब्रिटिश सरकार से पत्राचार तथा सम्पर्क बनाकर बादशाह को भारत लाने के लिए प्रयत्न करते रहे। अतः कुम्भ की सारी व्यवस्था के लिए श्री माँ ही प्रयाग रह रही थी।
यहाँ यह भी कहना अप्रसांगिक न होगा कि सन् 1934-1935 के मध्यान ही एक युवक विहार से नरसिंह बाग में अपने किसी मित्र द्वारा पहुँचा। उस युवक का नाम कुलानन्द मिश्र था। वह मैथिली ब्राह्मण थे तथा नौकरी की खोज में धौलपुर की यात्रा किए थे। उन्होंने बाबा को एक दिन अपनी प्रार्थना में बतलाया की उन्हें सिपाही की नौकरी धौलपुर में दिला दे। बाबा ने उसकी स्वीकृति दे दी। एक दिन राजा जब उनके दर्शन के लिए उपस्थित होने वाले थे। कर्मचारी लोग उनके बैठने की विशेष व्यवस्था का ख्याल रखकर एक अच्छी गद्दीदार कुर्सी राजा के लिए रख दिए थे। बाबा जब अपने कुटिया से निकलकर नरसिंह बाग में गये, प्रांगण में जहाँ बाबा ने राजा के बैठने की विशेष व्यवस्था की थी। बाबा ने उस राजा के कुर्सी पर उस बालक को बैठा दिया तथा अपने आसन पर स्वयं विराजमान हो गए। राजा के आगमन पर बाबा ने एक दूसरी कुर्सी पर उन्हें बैठने का इशारा किया। वे बाबा के चरण स्पर्श कर दूसरी कुर्सी में जाकर बैठ गए। बाबा सामान्य शिष्टाचार के बाद राजा का कुशल क्षेम लेकर थोड़ी देर बाद राजा को विदा कर दिए तथा बाबा का दरबार धीरे-धीरे उसड़ गया। तथा बाबा अपने अन्य कामों में व्यस्त हो गये।
लेकिन बालक के मस्तिष्क में अपने नौकरी को लेकर तरह-तरह के विचार उठने लगे। गरीबी और अमीरी के बीच के खाई में फँसा एक निर्धन ब्राह्मण बालक के मानसिक धरातल पर आँधी बहने लगी। एक तरफ परिवार का मोह, परिवार की जिम्मेदारी, संसार और संसार प्राप्त करने की तीव्र इच्छा। दूसरी तरहफ दैवी कार्यक्रम, जो बच्चे के भाग्य का निर्धारण कर चुकी थी। अचेतन मन का यह दबाव चेतन मन में बिना प्रस्फुरित हुए ही अपनी प्रबलता से चेतन मन के विचार को बड़ी मात्रा में प्रभावित करता है। यही है आदमी के द्वंद का कारण। भीतर कुछ कार्यक्रम, बाहर चेतन मन की कुछ और इच्छा।
इच्छा और संस्कार के इस संघर्ष में ही समस्त मानव मन की यात्रा द्वंद से आरम्भ और द्वन्द में ही समाप्त हो जाती है। इस द्वंद का अन्त तब होता है जब धीरेे से अचेत मन के कार्यक्रम अपनी विशेष भक्ति से मन के बाहरी इच्छा को दबा कर उस पर प्रभावित हो जाता है।
ऐसे ही कुछ हुआ होगा इस बालक के साथ। बाहर की परिस्थिति है। गरीबी, लाचारी, बेबसी, नौकरी। इन सब पर विजय पाने के एक बाह्य योजना तथा भीतर एक दूसरे महायोजना का कार्यक्रम जो इस युवक को अपना माध्यम बना कर ईश्वरी कार्यकर्ता बनाना चाहती थी।
बालक यह निर्णय न ले पा रहा था कि वह क्या करे। एक तरफ इसे दिख रहा था, अपना और अपने परिवार के गरीबी से ऋण दिलाने का एक उपाय। राजा के यहाँ सिपाही की नौकरी। एक छोटा प्रारब्धी के कारण है। अपनी दयनियता को मिटाने का विकल्प। दूसरे तरफ उनको यह भी सोचने को मजबूर होना पड़ा राजा की वह कुर्सी जिस पर स्वयं सच्चा बाबा ने राजा के बदले उसे बैठा दिया था।
गजब है, निर्णय की यह घड़ी, जब व्यक्ति अपने दो विकल्पों में एक चुनाव करता है, बहुत ही पीड़ा दायक और और द्वंदात्मक स्थिति से चित्त में दिग्भ्रमित होता है। क्या उसके लिए ठीक है, क्या गलत। यह निर्णय वह नहीं कर पाता है। मानव के इस उहा-पोह की स्थिति में उसे भीतर से सम्बन्ध होने के लिए बाद्यय होना पड़ता है। कोई प्रेरणा पूर्वक अभिप्सा से वह होते हुए भी आकंाक्षी बना रहता हैं।
बालक कुलानन्द के अन्तर्मन में भी यही सब बात भीतर की प्रेरणा कह रही थी मत करो नौकरी। मारो गोली घर-द्वार की जिम्मेदारी को। जिस बाबा के सामने राजा का सिर झुकता है। जो उसके आदेश का इन्तजार करता है। जिसने राजा की कुर्सी पर तुम्हें बैठा दिया। वह निश्चित ही राजा से महान हैं। राजा से अच्छा है। राजा उसका पैर छूता है। कोई न कोई शक्ति इस बाबा में होगी जिसके कारण से राजा भी बाबा का पैर छूता है।
दूसरा भाव यह था कि भौतिक जगत में बाबा भी धन के लिए राजा पर आश्रित है। बाबा की जरूरतों को राजा ही पूरा करता है अर्थात् बाहर से राजा सम्पन्न है, भीतर से बाबा। किस तरफ चला जाय। राजा और राजा के आधीन रहकर कार्य करने में मेरी भलाई है, या बाबा की सेवा में।
साधक और उसका मन साधक का यह मन बहुत ही विचित्र ढंग से कार्यरत होता है। जब वह विकल्प के दरवाजे पर खड़ा होता है। बाहर संसार और उसका आकर्षण। भीतर ईश्वर और उसका आकर्षण। अन्तः प्रेरणा के वे दबाव जो भाषान्तरित नहीं हुए हैं। लेकिन अपना दबाव बनाए हुए हैं। भारतीय दर्शन इन्हें संस्कार और प्रारब्ध भोग कर्म के नाम से जानता है। पश्चिम इसे अस्तित्व के अचेतन का दबाव कहता है। स्वयंता और वैशिष्ठता की बात करता है। तथा पूरब उसे कर्मफल मानता है। हेगल, कांट, स्पेनोजा के शब्द में इच्छा भक्ति के अचेतन में वर्तुल भक्ति का विस्फोट है। यह अचेतन का दबाव सम्भावनाआंें के आहत की सम्पूर्ण सम्भाव्यता की कुन्जी है। चाहे जो भी हो पश्चिम की सम्भावनाओं के अचेतन दबाव का हिस्सा हो या फिर पूरब के अनुसार कर्मफल के परिणाम का हिस्सा। मनुष्य के चुनाव में विकल्प ही बहुधा मिलता है। वह एक निर्णय पर बिना विकल्प सोचे पहुँच जाए। ऐसा होता नहीं। विकल्प में ही द्वंद है और यह द्वंद ही चेतन मन का विकास है। तथा विकल्पों में उचित चुनाव ही विवेक का प्रतिफल है।
कुलानन्द जी के कठोर निर्णय
कुलानन्द की इस मानसिक स्थिति में अचानक बदलाव आ रहा है। बालक भीतर की प्रेरणा से पूर्ण होकर संसार का आकर्षण, संसार की उपलब्धि का आधार भी वह राजा को न मान कर बाबा को मानने लगता है और अचानक बाबा के पैर पकड़ कर बोल पड़ता है। आज से मै केवल आपकी सेवा किया करूँगा। राजा की नौकरी की चाहत मुझमें समाप्त हो गयी। बस एक ही इच्छा है। एक ही संकल्प। बस थोड़ी जगह आप अपने चरणों में देकर मेरा जीवन कृतार्थ कर दें।
स्वयं सच्चा बाबा जी महाराज (स्वामी कुलानन्द) ने यह कहा था। कि जब तुम अपने आपमें होते, अपने माता-पिता के अन्तर्गत होते तो तुममें उसी प्रकार की माँग उसी प्रकार की आकांक्षा और वासना पैदा होने लगती। वे ही तुम्हारे आदर्श बन जाते है। उन्हीं के अनुरूप होना चाहते हो।
लेकिन भगवद् महायोजना के विस्तार के कार्य क्रम में जब तुम्हारा सामीप्य किसी संत से हो जाता। संत के पास अचानक ही तुम अपने आदर्श और जातिगत, वर्ण-गत संसार से प्रभावित होकर संसार की कामना करने आते हो। तब एक महा परिवर्तन की घटना घटती है। अचानक तुम बदले-बदले दिखने लगते हो।
22 वर्षीय युवक जिसने घर गृहस्थी संसार की उपलब्धि का सपना संजोये दिन रात उसे रूप देने के लिए प्रयत्नशील रहा। उसके सपना में यह अचानक भूचाल क्या किसी अदृश्य परिवर्तन शक्ति के कारण है। जिसने इसके परिवर्तन की बागडोर अपने हाथ में सम्हाल लिया है या किसी महद् संकल्प का प्रतिफल या इसके पूर्व मंे संचित कर्म का प्रतिफल। सत्य चाहे जो कुछ भी हो जब भी वह अचेतनमन में होता है तो रहस्यमयी होकर ही कार्य करता रहता है। यही रहस्य सत्य की विलक्षणता है।
बाबा ने इससे वह कहलवा लिया जो बाबा चाहते थे। अर्थात् यह बालक गृहस्थ त्यागी बनकर बाबा के आश्रम का अन्तेवासी बन गया और शरीर की सेवा करने लगा।
कुलानन्द जी और उनकी सेवा का दायित्व बाबा के निजी सचिव जिसका उल्लेख ऊपर ठाकुर दिवाकर सिंह के नाम से हुआ है। उनके घर-परिवार की सेवा की जिम्मेदारी भी इसी बच्चे पर आ पड़ी। उनकी लड़की सरला देवी जो अबोध बच्ची थी। उनकी भी सेवा टहल करने की बात बाबा स्वयं अपने मुख से स्वीकार करते हैं।
सरला देवी भी बाबा के अंतरंग अन्तेवासी मंे शामिल थी और बाबा उन्हें होतव्य शक्ति या प्रारब्ध शक्ति की मान्यता दे दिए। विशेष विवरण के लिए देखिए-ठाकुर दिवाकर सिंह द्वारा रचित ‘‘देवी प्राकट्य’’ यह पद्य रचना है। जिसमें इस महाशक्ति की एक संक्षिप्त जीवनी की चर्चा है। इस विषय की जानकारी देना प्रतिपाद्य विषय की चर्चा नहीं है। अतः इस विषय पर यहीं विराम लगाते हुए बाबा के लीला प्रसंग में प्रयाग चलें।
बाबा प्रयाग की ओर
यह भी कहते सुना गया है कि बाबा प्रायः अपने प्रयाग-प्रवास में तुलसी अखाड़ा (बांधपर) और रामानुज बाड़ा दोनो में रहे थे। बाबा का न कोई निश्चित स्थान था न कि निश्चित आश्रम। लेकिन बाबा के साथ मंडली चलती थी। साधु लोग तब मंडली में रहकर ही भारतवर्ष की यात्रा करते रहते थे। बाबा भी अपनी मंडली को लेकर प्रयाग के महाकुम्भ में भाग लेने के लिए प्रयाग पहुँचे। कुछ सूत्रों से सुनने में आया कि सिया सरकार सन् 1935 के अन्त में ही निर्वाण को प्राप्त हो गयी। इस संदर्भ की जानकारी बाबा के शक्ति अवतरण नामक शीर्षक में की जाएगी।
पुनः इनके निर्वाण के बाद बाबा ने परिवर्तन शक्ति का संकल्प रामानुज बाड़ा के पास ही दारागंज में रहने वाली एक महिला को दे दिया। जिसका व्यवसाय घर-घर जाकर चूड़ी बेचना था। जिनका शरीर सन् 1949 और 1950 के बीच निर्वाण को प्राप्त हुआ। उस महाशक्ति का नाम बागेश्वरी देवी के रूप में सच्चा चरित और लीला प्रसंग में वर्णित किए जाने की सम्भावना है।